• सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए संजीवनी से कम नहीं मेक इन इंडिया

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    ज्यादातर लोगों को ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महत्वाकांक्षी कैंपेन 'मेक इन इंडिया' बड़े भारतीय उद्यमों और वैश्विक कंपनियों के लिए ही मददगार साबित हो रहा है। हालांकि ऐसा बिल्कु़ल नहीं है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए भी 'मेक इन इंडिया' कैंपेन काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। पिछले दो सालों में ‘मेक इन इंडिया’ ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का कायाकल्प करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    हम भारत को आकार, प्रोद्यौगिकी के स्तर, उत्पादों की विभिन्नता और सेवा के लिहाज से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों में विभाजित करते हैं। ये जमीनी ग्रामोद्योग से शुरू होकर ऑटो कल-पुर्जे के उत्पाद, माइक्रो-प्रोसेसर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और विद्युत चिकित्सा उपकरणों तक फैला हुआ है। आमतौर पर बड़े उद्योग बड़े पैमाने पर निवेश लाते हैं, लेकिन वे अक्सर कल-पुर्जों और सहायक कामों के लिए लघु और मध्यम उद्योगों पर निर्भर होते हैं। इस तरह से बड़े उद्यमों की रीढ़ माने जाने वाले इन उद्यमों में विकेन्द्रित निवेश उतना ही महत्वपूर्ण है। इसीलिए 'मेक इन इंडिया' कैंपेन के तहत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को आगे बढ़ाने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं।

    हर उद्यम के लिए वित्त किसी शरीर में दौड़ने वाले खून की तरह होता है। अगर इसकी कमी होती है, तो उद्यम की सेहत खराब हो जाती है। सरकार ने इस बात को समझा है। इसलिए ‘मेक इन इंडिया’ कैंपेन के तहत इन उद्योग के लिए आसान कर्ज उपलब्ध कराने के लिए इंडिया एस्पायरेशन फंड (आईएएफ), साफ्ट लोन फंड फॉर माइक्रो, स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेस (एसएमआईएलई) आदि की शुरुआत की गई। प्रौद्योगिकी अधिग्रहण एवं विकास कोष का आरंभ नंवबर 2016 में किया गया, पारम्परिक उद्योगों के पुनर्सृजन के लिए निधि की योजना (एसएफयूआरटीआई) शुरू की गई। इनका मकसद आसान शर्तों पर कर्ज उपलब्ध कराना है। इनके अलावा माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट बैंक एंड रिफाइनेंस एजेंसी (एमयूडीआरए) की पहल भी इन उद्यमों के लिए काफी लाभकारी साबित हुई है।

    मेक इन इंडिया कैंपेन भारतीय कंपनियों के साथ-साथ वैश्विक कंपनियों को विनिर्माण क्षेत्र में निवेश और साझेदारी के लिए प्रोत्साहित करता है। यह एक अच्छी अवधारणा है जो भारत के लघु उद्योगों के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक है। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान बहुराष्ट्रीय कंपनियों को निवेश और अपने उपक्रम स्थापित करने तथा कोष बनाने के लिए आकर्षित करता है। इससे उत्पादों और सेवाओं की विभिन्नता, विपणन नेटवर्क और तेजी से विकसित करने की क्षमता के लिहाज से सूक्ष्म, लघु और मध्यम आकार के उद्यमों को काफी फायदा होगा।

    सूक्ष्म, लघु और मध्यम आकार के उद्यमों के कारोबार को आसान बनाने के लिए आसान कर प्रणाली बनाई गई। 22 इनपुट या कच्चे माल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी ने विभिन्न क्षेत्रों में विनिर्माण लागत में कमी आई। इससे उद्यमों को अपना दायरा बढ़ाने में मदद मिल रही है। वस्तुओं के निर्यात और आयात के लिए जरूरी दस्तावेजों को घटाकर तीन कर दिया गया। भारत सरकार की 14 सेवाएं ई-बिज़ के ऑनलाइन सिंगल विंडो पोर्टल के माध्यम से मिलने लगीं। औद्योगिक लाइसेंस की वैधता बढ़ाकर तीन वर्ष की गई। रक्षा उत्पादों के प्रमुख कंपोनेंट्स की सूची को औद्योगिक लाइसेंस से अलग किया गया। नए बिजली कनेक्शन के लिए एनओसी/सहमति की जरूरत को खत्म कर दिया गया। 50 करोड़ रुपये तक का वार्षिक कारोबार करने वाली छोटी कंपनियों के लिए इनकम टैक्स घटाकर 25% किया गया है, ताकि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम कंपनियों को अधिक व्यवहार्य बनाने तथा फर्मों को कंपनी प्रारूप में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

    आंकड़े बताते हैं कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम आकार के उद्यमों का पिछले कुछ वर्षों में काफी विकास हुआ है, जिसका असर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी देखने को मिला है। छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान 10 प्रतिशत से ज्यादा विकास दर दर्ज कराई है। इस क्षेत्र ने देश की जीडीपी में 38 फीसदी का योगदान दिया है। इसमें विनिर्मित उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 45 फीसदी है, जबकि इसका निर्यात 40 फीसदी रहा है। इस क्षेत्र ने 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया कराएं हैं। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम 8,000 हजार से ज्यादा उत्पाद का उत्पादन करते हैं।

    सीआईआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 तक भारत की जीडीपी में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का योगदान लगभग 50 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है। यह सूक्ष्म, लघु और मध्यम आकार के उद्यमों के लिए मेक इन इंडिया कैंपेन के तहत दी जा रही सहूलियतों का ही परिणाम होगा।


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